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He is a well known writer from Lord Krishna’s Birth Place : Mathura. He writes in Brij Language. He is also a A Grade Officer of BSNL India.Writing is his Hobby and Passion. When Ever he get time he give time to his passion. He is totally devoted to Lord Krishna.
परिचय  पुँज  :———
 
गोलोक धाम का धरा रूप , भाव आनंद भक्ति द्धारा मन मतंग को बांधने मैं सक्षम बृज , मेरे इष्ट आनंदकंदश्रीराधिके श्री कृष्ण की कृपा से ओतप्रोत रहा था तथा आज भी उसी तरह की कृपा से ओत प्रोत है  बृज के ठाकुरयुगल स्वरूप श्री ब्रजेश्वरी ब्रजराज के कृपासागर मैं खिले कमल दलों की नरम नरम कोमल पंखुड़ियों से निकलनेवाली अलौकिक सुगंघ पूरे  ब्रजमंडल को सुवासित कर रही है  उसी पावन ब्रजखण्ड मैं श्री गिरी गोवेर्धन की  तलहटी मैं बसे गॉंव भगौसा को मेरी जन्मभूमि बनाकर ,अपनी मेरे ऊपर सदां रहने वाली कृपा से मेरे जीवन को धन्य कर दिया  
 
  बृज का भोर आनंदमयी विलक्षण  है  जो बृज को अन्य संसार से अलग करता है  । झालर घंटों का तुमुलघोष   मृदंग  करतालों की करणप्रिय ध्वनि , शंखों का उदघोष 
 , स्तुतियों के शब्दब्रम्ह  ,   बृज को गोलोक बना देते हैं । आरती के परम मांगलिक वातावरण ,प्राण वायु  ,जीवन रस आच्छादित भोर की बेला मैं परमपूज्य माँ श्रीमती संता   [ शांति देवी ] ने विक्रम सम्वत २०१७ तिथि शुक्ल पक्ष की दशमी को ०४  बजकर तेतीस मिनट अंग्रेजी समय बर्ष     २६ जनवरी  सन २०६१ को मुझे जीवन प्रदान किया । कृपामयी ने जीवन को सार्थक करने हेतु [ श्रीकृष्ण सेवा
हेतु] शरीर देकर  एक अवसर प्रभु के चरणों मैं समर्पित होने के ,  प्रदान किया था  । साधन से साध्य प्राप्त होता है मंगलमयी बंदनीय माता का ऋण उतारना असंभव है पर श्री कृष्ण की आराधना नामजप भजन कीर्तन भक्ति से जननी का भी कर्ज उतारा जा सकता है श्रीकृष्ण भक्ति ही इसका सिद्ध मार्ग है ममत्व मूर्ति  जननी  की कृपा,   प्रभु कृपा ,बृजबासियों का सानिध्य साहचर्य सहज हो गया ब्रजवासी गृहस्थ भी भटकते साधुओं से श्रेष्ठ होता है बृज मैं रहने से मन कृष्ण भक्ति की कल्याण करने वाली तरंगों से टकराता रहता है और एक दिन उसमें रँग जाता है इसीलिए ये बृज भक्तों को ,रसिकों को तथा ऋषि मुनि साधुसंतों योगियों और निर्गुण ब्रह्म की कठिन गूढ़ साधना करने वालों को भी लालायित करता है इस परम पावन ब्रजभूमि मैं जन्म मिलने  से मैं गुपाल रामगोपाल सिनसिनवार अनायास ही कृष्णकृपा से कृतकृत्य
हुआ धन्य हुआ  ब्रजभूमि को मेरी जननी ही का अन्य रूप जानकर, मानकर मैं श्रद्धा से नमन करता हूँ वंदन करता हूँ  
 
 
दसवीं का  अवरोहण तथा जया एकादशी आरोहण उसीदिन था ।   मेरे पितामह श्रीमान टीकमसिंह गॉँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे मेरी दादी श्रीमती रेशम देवी थीं ।   सद्गुणों से संपन्न वे     ममतामयी पितामह की परछांई सी स्नेहस्वरूपा आज भी हिरदय पटल पर अंकित हैं ।       उनके     चार पुत्र थे श्री खिल्लन सिंह ,मेरे पिता श्री किशन सिंह,श्रीचंद सिंह ,श्री लटूर  सिंह   थे ।  चारों  ही माताओं का स्नेह मुझे प्राप्त हुआ।    बड़ी मां श्रीमती राम ढकेली , मेरी माँ श्रीमती संता , मँझली माँ श्रीमती सोनवती ,एवं छोटी माँ श्रीमती शारदा  ।    मेरा पत्रिका का नाम उपेंद्र ,तथा गॉँव का नाम गुपाल ,गोपाल ,रामगोपाल ,रामगोपाल सिनसिनवार रामगोपाल राधे राधे ,रामगोपाल राधे कृष्णा समय के साथ बदल रहा था ।  
मेरे बड़े भाई श्री रामवीर सिंह जो बड़े माता पिता के पुत्र थे ।    हम दोनों दिनों दिन , बढ़ रहे थे , ,बचपन अपनी ऑंखें खोल रहा था।     पढ़ना ,खेलना ,मंदिर आरती ,सत्संग ,पठन पाठन शास्त्रों ,रामायण भागवत ,भक्तमाल ,श्रीमद्भागवत गीता , तीसरी क्लास से ही पढ़ रहे थे ।   संतों का सानिध्य जीवन का वरदान था । संतों को जिज्ञासु बच्चों मैं बड़ा  ही  आनंद आता है  ।  ।  वे महात्मा अपने दुर्लभ समय मै से हमको भक्ति ज्ञान  की बाते बताते थे । तपस्वी बंगाली संत बाबा श्री श्री १००८ राधिका दास गाँव किनारे बना मंदिर की आरती कीर्तन ग्रंथो का पठनपाठन ,साधुओं का आगमन ,दर्शन ,बाल्य काल मैं प्रभू प्रदत्त वरदान से कम न था पूर्व जन्मों के पुण्य प्रारब्ध से यह संयोग संचालित था आज मुझे लगता है
प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्कूल , इंटरमीडियेट गिरी गोबर्धन दयानन्द आर्य विद्यालय  से , बिजली अभियांत्रिकी मैं तीन साल का डिप्लोमा प्रथम भारतीय सरकार काबुल मैं बनाने वाले राजा महेन्द्रप्रताप के प्रेम विद्यालय से की थी । उन  दिनों पैसे की कमी परिवार मैं थी गाँव मैं थी देश और प्रदेश सबका हाल एक जैसा था ,जिसके कारण जोधपुर इंजीनिरिग कालेज से इंजिनीरिंग करने का सपना पूरा नहीं हुआ । इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीयर्स कलकत्ता से पार्ट ऐ पास किया तथा पार्ट बी पूरा नहीं हुआ था ।
 
  जिस,के कारण जोधपुर इंजीनिरिग कालेज से इंजिनीरिंग करने का सपना पूरा नहीं हुआ  और  इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीयर्स कलकत्ता से दूरसंचार बिभाग मैं नौकरी करते  पार्ट ऐ पास किया तथा पार्ट बी जीवन की व्यस्तताओं के कारण पूरा नहीं हुआ  । मैंने अपने गोविन्द की कृपा मानकर इसे स्वीकार कर लिया 
बचपन के दिनों उन दिनों यातायात के साधन नहीं थे ।   हमारे खेत गोवरधन  तथा बरसाना मार्ग पर थे ।   संतों की टोलियां , उन दिनों पैदल यात्रा करतीं थीं ।   बचपन के पटल पर ये कहाँ जा रहे है ,ऐसा क्यों कर रहे हैं।    जिज्ञाषा उत्पन्न करते थे   ।         जीवन और मरण , स्वार्थ की बातें , निस्वार्थ की बातें ,सेवा त्याग की बेल दिन पर दिन पल्ल्वित होती जा रही थी ।   परिवार जन ,गुरुजन ,मित्रजन सभी  उसकी  तरफ आकर्षित थे ।    घंटों बुजर्गों के साथ ,  घंटों मित्रों के साथ ,घंटों साधुसंतों के साथ कुछ न कुछ छाप रोज प्रदान करते थे । कुशाग्र मेधा के धनी विचार मंथन कर ग्रहण करते जा रहे थे   भक्ति के अंकुर बिकसित होकर  वृक्ष बनते जा रहे थे ।  
 
 [  भगवतपुर  गौचारण युग  का नाम ] अपभ्रंश होते होते भगौसा हो   गया हो   इस बारे मै    ऐसा  कोई प्रमाणनहीं है ,गॉंवों के नाम ईश्वर के नाम से जुड़े होना, बृज की परंपरा है   मेरी मान्यता की धारणा   का यही आधार    है  गॉवं का खेरा  बहुत विशाल है  जो इस ग्राम की प्राचीनता का  साक्ष्य है  गाँव मैं एक बिहारी जी का मंदिर है,दूसरा शिवालय जो गांव के
अग्रवाल परिवार ने बनाया था 
   एक वंशीदास बाबा का मंदिर है ।  यह मंदिर कच्ची मिटटी से बना था   इसी मैं बाबा वंशी दास अपने ठाकुर श्री कृष्णा के साथ विराजते थे    तथा जिस मंदिर ने मेरे जीवन को ज्ञानभक्ति के आलोक से आलोकित किया वह परमपूज्य  श्रीराधिका दास जी बाबा का  है ।   सभी मंदिर गांव के तालाब के किनारे स्थित थीं  । यह मंदिर बाबा की दिल्ली वाली शिष्या ने बनवाया था  इसके चारों ओर नीबू तथा आम के बृक्ष ,कन्नेर गुलाब गेंदा के फूल तथा नागफनी की विशाल सुरक्षित दीवार थी ।    अब जीर्ण मंदिर की जगह सामूहिक पैसे से सिनसिनवारों ,तथा अन्य फौजदारों ने नया गोपाल जी का सुंदर मंदिर बनवा दिया है ।   यहाँ की युगल स्वरूप मूर्ति गोविन्द कुंड आन्यौर चली गईं  हैं ।   भोले नाथ का मंदिर मेरे स्वर्गीय पिता श्रीमान किशन सिंह जी की याद मैं मेरी माता श्री तथा अनुजों ने  , बनवाया  है 
 पढ़ते समय ,श्रीगोपाल मंदिर बड़ा बाजार गोवरधन     ,  चकलेश्वर महादेव ,महाप्रभु मंदिर  श्रीकृष्ण जन्मस्थान मथुरा आदि पवित्रतम स्थानों का जीवन धन्य बनाने मैं बड़ा योगदान रहा ।  मथुरा बृंदावन  गोवरधन , कामवन ,लठावन डीग, आदि  बद्री ,केदारनाथ ,भोजन थाली  ,चरण पहाड़ी ,मानसी गंगा राधाकुंड   आदि मैं निवास ने भक्ति श्रंखला को मजबूत ,लह लहाने का मौका दिया ।
 दिल्ली विद्युत् प्रदाय कम्पनी मैं प्रशिक्षु के तौर पर एक साल पूरा करने के बाद दूरसंचार बिभाग मैं ,निरंतर कार्य करते हुए , समय के थपेड़ों की उष्णता मैं तपकर कुंदन की तरह व्यक्तित्व निखरने लगा  ।  शब्द मूर्त होकर जीवंत रूप लेकर जीवन की जीवंतता को उकेरने लगे ।
गिरिराज गोवर्धन के बड़े बाजार स्थित श्री गोपाल जी मंदिर के पुजारी ब्रह्मलीन कीर्तन निष्ठ  भक्त संत बाबा श्री सच्चिदानंद की कृपा दृष्टि मेरी और उठी ।गोपाल मैं तुम्हें  श्रीकृष्ण प्रभु के मार्ग पर सतत अग्रसर होने के लिए दीक्षा मंत्र दूँगा ।  तुम कल आ जाना ।
 मैं प्रफुल्लित मन से दूसरे दिन साष्टांग दण्डवत कर उनके चरणों मैं बैठ गया ।  उन्होंने मुझे कृष्ण सगुणभक्ति के दुर्लभतम मंत्र प्रदान किये    जो साधुओं को भी बड़ी साधना के पश्चात् मिलते हैं । पूजा के बिधि बिधान से अवगत कराया । उन  कृपा सिंधु  ने अपनी  पूरी कृपा को मेरे जीवन पर उड़ेल दिया था ।   कहते गुरु ही गोविन्द तक पहुँचाने वाले हैं। महात्मा कबीर दास ने कितना सत्य लिखा है 
गुरु  गोविन्द दोउ खड़े  काके  लागूं  पांय  ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दीन  बताय  ।
कई साधुओं द्वारा प्रतिपादित सिद्धातों से मन सन्यास की तरफ अग्रसर हो रहा था  । संसार    की    असारता  से   मन   मैं   मानव जीवन का प्रयोजन क्या है  , जिज्ञासा बढाती रहती सत्य क्या है ,जीवन ,संसार , मोक्ष , आत्मा परमात्मा  निरंतर मन मैं जीवंत होते रहते थे। शादी सम्बन्ध के लिये लोग आते रहते थे है ।
इसी संशय मैं अपनी मनभ्रांति तथा गुरु आज्ञा हेतु उनके मंदिर पहुँचा ,मैंने अपनी बात गुरुदेव  को बताई गुरुदेव ने पहले गृहस्थ फिर सन्यास को उत्तम बताया ।
प्रारब्ध प्रसाद , -प्रकृति नियत हरियाणा प्रान्त के सरपंच श्रीमान नत्थीसिंह जी की पौत्री ,श्री गुलाब सिंह जी की सुशील सुकन्या शुभे सविता मेरे गृहस्थ जीवन को आलोकित करने आ गयी हैं ।  उनने जीवन को आलोकित करते हुए तीन पुत्री रत्न ,  तथा दो पुत्र रत्नों को जन्म दिया  । 
गाँव निवास  ,गोवर्धन निवास  , मथुरा निवास ,मारवाड़ प्रवास भीनमाल जालौर जोधपुर पाली भुसावर डीग कामां भरतपुर जयपुर ,बांदीकुई ,मालवा प्रवास ब्याबरा राजगढ़ सब जगह अनुभव को कलमबंद करने की कोशिश हुई ।
  कभी कविता ,कहानी ,दोहे ,निबंध स्तुति ,भक्ति गीत ,जगत गीत ,जगतगीत लिखते लिखते नींद आने तक कठिन श्रम बाल्य काल ,अध्ययन काल ,सर्विस काल जारी रहा । जीवन मैं कभी कभी प्रभु प्रबुद्ध जनों से मिला देते हैं ऐसे साहित्य मर्मज्ञ श्री रामशरण पीतलिया ,कदम्ब कामबन भरतपुर एवं सर्व श्री पूज्य गोपाल दास जी मुदगल डीग भरतपुर की भेंट मेरी ब्रज साहित्य यात्रा मैं मील का पत्थर बन गयी । उनका मैं वंदन करता हूँ अभिनन्दन करता हूँ ।

मुझे इतना पता नहीं मैंने किस किस का सहयोग इस कार्य लोग मैं परोक्ष और अपरोक्ष रूप से मुझे मिला है मैं उन सभी गुणीजनों सुहृद जनों मित्रों का हार्दिक नमन करता हूँ मैं अपनी बिदूषी पत्नी जिन्होंने इस कृष्ण भक्ति के लेखन कार्य मैं मुझे सहयोग दिया बहुत आभारी हूँ सांसारिक कामनाओं हेतु धन कमाने हेतु प्रेरित करने वाली ,लिखने से क्या होगा मेरे लिये ध्येह वाक्य बन गया उनकी पीड़ा समय न दे पाने के लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ मेरे पुत्र पुत्री के सहयोग के लिए भी धन्यवाद् करता हूँ क्योंकि कृष्ण गुणानुवाद से इस कार्य से उनकी कुछ अभिलाषाएँ हो सकता है मैं पूर्ण न कर पाया हूँ उनके लिए
प्रभु श्रीकृष्ण से प्रार्थना करता हूँ उनका मंगल हो ,परिणामत मेरा मंगल हो

मैं अपने साथी मित्र भाई श्री संदीपसिंह , श्री रवि हंसवाल का भी हार्दिक ,धन्यवाद करता हूँ उनने अपने अमूल्य समय मैं से कुछ समय निकाल मुझे लेखन मैं सहयोग दिया

मालवा के जनपद राजगढ़ के ब्यावरा नगर मैं सर्विस के दौरान मनीषी श्री मनीष जी त्रिवेदी जी से मुलाकात हुई ,बात हुई  ।  www .gopalkrishna .in ki आधार शिला रखी गयी  रजिस्ट्रेशन हुआ ।एवं उनकी धर्मपत्नी विदूषी मनीषा ने इस कृष्णागुणानुवाद को साइट के रूप मैं प्रस्तुत किया मैं उनके सहयोग के लिए उनका हार्दिक आभारी हूँ कृतार्थ हूँ अजीब संयोग २०१८ [ २०१८ ] लोक कल्याण करने वाले भगवान त्रिपुरारी शंकर की महाशिव रात्रि को प्राप्त हुआ मुझे पूर्ण विश्वास हुआ कि अवढर दानी भोले नाथ की कृपा इस साइट पर हो गयी यह मेरे कल्याण के साथ साथ जो इसे पढ़ेंगे जीवन मैं उतारेंगे उनका कल्याण करेगी आशुतोष भगवान को शत शत नमन ।
 और उसी मैं कृष्ण गुणानुवाद  , जगत वाद ,माया अध्यात्म सभी को उचित स्थान देने का संकल्प मैंने लिया।और विदूषी मनीषा ने
 डिजिटलाईजेशन  रूप  देकर ज्यादा से ज्यादा प्रबुद्ध पाठकों को सरल आधार प्रदान किया 
मैं क्या कहूँ इनका कोटि कोटि आभार
लेखन ज्ञान की अनंत साधना है , आत्मसंतुष्टि एवं जगत कल्याण हेतु जो साहित्य लिखा जाता है   वह लेखक व संसार का मान बढ़ाता है।  पिता जी द्वारा हमेशा ही गाँव मैं रहना वाक्य जयपुर बच्चियों के अध्ध्य्यन हेतु काल कवलित हो गया था ।
  डीग से सीधा जयपुर निवास बदलना उसके बाद गृहस्थ की मशीन बनना , अपने पिताश्री माताश्री , परिवार का बदला व्यवहार  स्वार्थी जीवन की वास्तविक रूप से कठोर परिचय करा गया था । संसार मैं लिखने हेतु ,उसको एक महत्वपूर्ण अवसर दे गया था।
ले देकर जयपुर नगर मैं गोविन्द कृपा हुई और बच्चों हेतु एक आशियाना आधा अधूरा बन गया । श्रीमती सविता भी घर पाकर खुश थी । कृष्ण कुटी नाम का निज निवास बच्चों के निवास हेतु उपलब्ध है । बृजवास का सपना ,  अभी सपना  बना है , नौकरी से मुक्ति , परिवार की जिम्मेदारी से मुक्ति  होने उपरांत  , ब्रजबास की हार्दिक तमन्ना  पिता जी के शब्द कानों मैं गूंजते नजर आते हैं । तुम गाँव मैं रहना ,शब्द शक्ति भी है ,शब्दब्रह्म भी है ,शब्द आदेश भी है मन मैं बृज मैं अपने पुरखों के खेतों के बीच गोबर्धन बरसाना बीच एक कुटी आश्रम निवास अभी बनाना है  ।
 
  
     कृष्ण कुटी                               
सविता सिंह  रामगोपाल सिनसिनवार
१ ६   श्री राम विहार कालोनी न्यू सांगानेर रोड
जयपुर  ३०२०२०
 
 
 
       कृष्ण कुटी 
भगवतपुर  भगौसा गोबर्धन
   बरसाना रोड   मथुरा