प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी

[  १   ] 
प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी
स्वपन  न   अलि   हौं    स्याम    तिआरौ     ।
गली सांकरीन चलि हौं आनौं       ,    प्रेम लाड़ली  भारौ       ।
जीनों  प्रिया  भयऊ  ब्रज आपद  ,   जप  तप कीनों  भारौ    ।
कीरत   कीरत  सुता  अनूपा    ,     रूप गुनन    ,मन धारौ  ।
मात   तात  धैनू  मित   छांड़े      गह्यौ  आन  निरप   द्वारौ ।
भानुनंदिनी   लखि  सुखपाबौं          बूढूं   देउ      किनारौ   ।
”गुपाल”  चरन   राधिके     दासा       मोहन  नाम   हमारौ   ।
हिंदी  भावार्थ  : —
 हे सखियौ मैं  तुम्हारा स्यामसुंदर कृष्ण  हूँ ये वास्तविकता  है यह
कोई स्वप्न नहीं है।मैं बरसाने की संकरी [ कम चौड़ी  ] गलियों
से श्रीराधिके  और आप सभी के प्रेमवश मोह के वशीभूत होकर
आया हूँ। प्रिय सखीयौ  ब्रज मैं श्रीराधिके  की तपस्या जप के
कारण मेरा   जीना कठिन हो गया है ।  कीर्तिकुमारी  की कीर्ति
बहुत ही शुभ हैं उनके रूप गुणों को अपने मन मैं धारण कर मैं
उनकी तरफ आकर्षित हो गया हूँ। मैंने अपने माता पिता मित्र
गायों को छोड़कर राजा ब्रषभानु के दरवाजे पर आ गया हूँ। मैं
      श्री वृषभानु की लाडली बेटी श्री राधिके के  प्रेम मैं डूबा जा रहा हूँ
  हे सखीयौ मुझे डूबने से बचालो। मेरा नाम मोहन है मैं राधिके
के चरणों का सेवक हूँ ।
[  २     ]
पकरे हरि  कर  जुरि मिल आनी  ।
हांसी  सबै   रूप  रंग  मोहक  ,मोहकता    हरि   भानी  ।
रुचिर झूलना  खेंच बिठारे    ,   देखउ   बाट   सुहानी   ।
झूला   सुंदर   पाटिल   सुंदर      रेशम  डोर  लुभानी    ।
टेरत राधे आवौ मोहिन          , लाजौ न   सकुचानी    ।
जप तप पूरन जानों प्यारी     ,   निरखउ नेह निभानी  ।
मिंतर आने    प्रीत निभाने     ,   आबो सखी   सुहानी  ।
लाजवंती सखि  भेंटत न हरि   , स्वेद बूंद  टपकानी    ।
प्रथम मिलन उत्कट अनुरागा ‘’गुपाल’’प्रीत लपटानी ।
हिंदी  भावार्थ      : —  
सभी  सखियो  ने  एकसाथ इकठ्ठी होकर बालकृष्ण के हाथ पकड़
लिये हैं। उनका रूप लावण्यमन को लुभाने वाला है उनकी मोहक
कर देने वाली अदा श्रीकृष्ण को भा रही है रेशम डोरी चन्दन पटली
वाले  झूले पर उन्होंने  श्रीकृष्ण को बिठा दिया।वे बोलीं कि स्याम
सुंदर आप श्री राधिके की बाट देखना हम उस कल्याणिनी सुहानी
को बुलाकर लाती हैं।    हे  सखी  राधिके मोहन  आ   गये हैँ तुम
लाज शर्म न करो और आ जाओ।तुम्हारी सारी तपस्या अब
पूर्ण हो गयी  है  तुम नेह  निभाने आ जाओ । अरे तुम्हारे मित्र
प्रीति  निभाने  आगये । लाज के  मारे श्रीलाडली  जी का बुरा
हाल  है। अकुलाहट प्रीतम को पाने की प्रसन्नता के कारण
तन रोमांच से परपूरित है स्वेद स्वरूप उनके शरीर पर
आच्छादित है उनके  शरीर से पसीने की बूंद टपक रहीं हैं।
श्रीगोविन्द से  मिलने  का  बड़ा  भारी प्रेम  है  श्री गोपाल
की प्रीत मैं  श्रीराधिके  लिपट गयीं हैं ।
[    ३      ]
ललिता   ललित    सजावइं    थारी  ।
गागर परिपूरन  जल जमुना    चरन पखारन   सारी   ।
सुमरत पग कोमल माधौ मधु  , भिड़ीं  सखी तइयारी   ।
सुंदर बसन विशाखा  लीने     ,  रंगदेवि  रंग धारी          ।
चौमुख दिवला बाती गूंथी       ,  चंपक  सखि  गुनबारी  ।
चंदन रोरी  चाबल  कुमकम    ,   गौरस  दधि गौ कारी      ।
सुमन बिबिध चुनचुन हिअ उमगत  सुघड़ सुदेवि कुमारी।
”गुपाल ” टेरत जुरमिल ,राधे    , आतुर अलि   बनबारी     ।
हिंदी  भावार्थ      : —
 परम सुंदरी ललिता ने भगवान श्रीकृष्ण की पूजा हेतु थाली सजा ली ।
एक सखी ने एक गगरी को जमुना जल से भर लिया  ।  उस  जमुना के
जल  से ,     वे  श्री  केशव के  चरन पखारेंगी धौएंगी ,साफ करेंगी । अपने  अपने
हाथों   से  श्री गोबिंद  के  कोमल  पैर धोने की वे तैयारी ,कर रहीं थीं ।
वे मीठे लगने वाले [ प्रिय लगने वाले ]श्रीकृष्ण के चरणों को याद कर
रहीं हैं बिशाखा नाम की सखी ने श्रीकृष्ण के लिए सुंदर वस्त्र लिये ।रंगदेवी
ने  रंग ज़माने के लिए बिभिन्न रंग का वस्त्र चुना है । अत्यंत गुणवान
चम्पकलता ने चारमुँह वाले दीपक मैं बत्तियां तैयार  कीं।
चन्दन रोरी चावल कुमकुम , काली गायों का दूध और दही  दही लीनी।
बिभिन्न प्रकार के फूलों को इकठ्ठा कर सुदेवी ने जमा लिया ।
वह अपने हिरदय मैं प्रफुल्लित है सारा सामान  इकठ्ठा करके वे सभी
सखियाँ  श्री राधिका को बुलाने लगीं । और कह रहीं हैं कि राधे
गोविन्द  तुमसे  मिलने को उतावले हैं
[   ४    ]
झूला  बैठे     हरी         अकुलाबइं  ।
द्वारे  आड़  ठाड़  सखि   दोनों  , मंद  मंद   मुस्काबइं      ।
चंचल स्याम कैद ललि कीने   , विवस प्रेम  सुख   पावइं।
इत उत नूपुर धुनि प्रभु चोंकत, समझत  प्रिया  इतावइं   ।
प्रभू   दसा लखि प्रेम  बाबरी   ,   धीरज मन्त्र     बताबइं     ।
मोइ  भाव देउ  दंउ  भगतन ,  हौं  ,निज वचन   निभावइं।
वृसभानुपुर भवन  रंगीली    ,   भाव  भंगिमा       भावइं   ।
लीला मिलन परम सुख    दैनी ‘ गुपाल ” गुपाल बतावइं ।
हिंदी  भावार्थ      : —
 झूला पर बैठे श्री गोविन्द श्री राधिके से मिलने को आतुर हो रहे हैं।
द्वार पर खड़ी सखियाँ गोविन्द की दशा देखकर मुस्करा रहीं हैं ।
वे कह रहीं हैं कि प्रेम की विवशता का आनंद देखौ मोहन कितने
प्रसन्न हैं , आनंद ले रहे हैं । इधर उधर नूपरों की धुनि सुनकर
वे प्रिय  राधिके  का आगमन समझने लगते हैं ।भगवान की प्रेम
में अधीरता देख सखियाँ उन्हें धैर्य रखने की सलाह दे रहीं है।कृष्ण
कह रहे हैं कि  हे  राधिके  अगर तुम मुझे भाव दोगी  तो मैं तुम्हारे
भक्तों को भाव दूंगा ।  मैं  इस वचन को निभाउंगा । वृषभानुपुर मैं
उनकी   [ श्री कृष्ण की [ भाव भंगिमा ] रंगीली राधिके को सुख देने
वाली है ।  उनके मिलने की     लीला सौभाग्य को  बढ़ाने वाली है  ।
जो गोपाल के मन की रुचिकर लगती है सुहाती है
[    ५     ]
देउ  सखी  मांगऊं कर  जोरी   ।
विसरावों  ना   सखिअन कबहूं   , प्रेम स्वरूपा   भोरी     ।
पाइ    प्रेम माधव मन प्यारी    , चंदा किरण चकोरी    ।
नेह सदां  सबै  करिहों  याचन     ,छलिया   प्रेमबिभोरी  ।
प्रेम कृष्ण अमर तुम करीऔ      ,   करिऔ   याद  किसोरी  ।
देउ    वचन   नटनागर  नागर,  प्रेम  बिभोर  बिभोरी       ।
सखी राधिके कीन अभअ   ,सब     मोहक    मोहन   ओरी   ।
” गुपाल ‘सखि भईं सब उपक्रत  जय जय कीन  किशोरी   ।
हिंदी  भावार्थ      : —
 सभी सखियाँ श्रीराधिके से बोलीं कि
हे सखी हमें वचन दे दो कि तुम हमें कभी न   भुलाओगे ।
हमेशा याद रखोगी क्योंकि कृष्ण सब कुछ भुला देने वाले
हैं। हे भोली प्रेमस्वरूप सखी कभी तुम हमें न विसरा देना
भुला न देना  । हे राधिके तुम हमें सदां प्रेम देना नेह करना
,क्योंकि
श्रीकृष्ण सब कुछ भुला देने वाले हैं। तुम श्री कृष्ण से
अमर  प्रेम करना पर हमें भी न भूलना ।श्री राधिका ने
अपनी सखियों को अभय कर दिया ।  और कहा कि
श्रीकृष्ण अपनी जगह हैं वे अपनी जगह की  चिंता न करें।
गोपाल कहते हैं लाडली श्रीराधिके ने वचन देकर अपनी
साखियॉ को उपकृत कर दिया।
[  ६     ]
[ प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी]
गहीं भुजा   साधी   सखी    प्यारी   ।
ठाड़ी   कीन  अलौकिक   राधे   ,रूप  लखत    गुनबारी  ।
लाज रही लजवन्ती राधे       ,ललिता नजर उतारी       ।
लाल कपोल  चित्तहर चितवन ,           चंद्रप्रभा मुखबारी ।
काजल नैनन टीकी अनुपम    ,   म्रग नैनी  सखि  प्यारी      ।
पलट पलट चंचल सखि निरखत , राधे लाढ़ कुमारी           ।
सखी  होइ तू आज  ‘गुपाला ‘    ,   राखौ     लाज  हमारी     ।
श्रीराधे      भर    दीनीं   हामर    ,   छाई      नेह       खुमारी ।
हिंदी  भावार्थ      : —
 सखियों ने    श्री राधिके की भुजा पकड़
अनिर्णय की स्थित से उबार उठा लिया।सभी गुणवान सखियों
ने श्री राधिके को  खड़ा कर दिया ,और वे अपनी सखी की
सुंदरता को निहारने लगीं।सभी मन को अपनी अलौकिक छबि
से हरने वाली राधिका की नजर श्री ललिता  उतारने लगी। उनके
कपोल सुर्ख लाल , उनका देखना ,हिरदय को चुरा लेने वाला मुख
की कांति चंद्रमा की कांति को लजा देने वाली है  हिरनी जैसे सुंदर
नैनों मैं काजल लगा है  माथे उपमा विहीन टीकी लगी है । सभी
चंचल सखियाँ श्री राधिके को बारी बारी से घुमा घुमा कर देख रहीं
हैं। हे कीर्तिकुमारी आज से तुम मोहन की हो जायेगी।तुम हमारी
लाज रख लेना ।  श्री राधे ने उनको हाँ भर दीनीं ।
[  ७   ]
प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी
चलीं घेर  श्रीजी सखी स्यानी  ।
ललित विशाख सुदेवी देवी              ,   रति  रंगरूप  सुहानी      ।
चम्पकलता लता गुनबारी                ,     चक्र     घेर घिरयानी   ।
अंगुल अंगुल   मंगल मूरत            ,   बसुधा सोह सुहानी          ।
चौक चौक सखि निकसत सिहरत    ,  मिलन जान हरसानी        ।
मदमाती  मदमस्त   भईं सब           ,   थिरकत  जात सुहानी     ।
धुनि समधुर ”गुपाल  ”सुनि लीनी    ,    कर   जोरे    अगवानी     ।
हिंदी  भावार्थ : —
सभी सुंदर सखी   श्री राधिके   को  लेकर   भगवान
स्यामसुंदर के पास लेकर जा रहीं हैं  । ललिता ,विशाखा है देवी है तथा
सुदेवी तथा अन्य बहुत सखियाँ हैं।अनेक गुणों से युक्त सखियाँ इकठ्ठी
होकर श्री राधे जी को घेर कर जा रहीं हैं।पृथ्वी देवी अंगुल अंगुल मंगल
मूर्ति श्री राधिके को देख प्रसन्न हो रहीं हैं और स्वयंशोभायमान हो रहीं
हैं।श्री राधिके हवेली के हर चौक पर सिहर जाती हैं , लजाती हैं , लेकिन
प्रभुमिलन अत्यन्त समीप जान हर्षित होती हैं । सभी सखियाँ श्रीकृष्ण
प्रेम मैं उन्मत हुई  मस्त होकर  सभी सखियाँ श्री कृष्ण प्रेम मैं उन्मत हुई
   मस्त होकर नाचती हुई  प्रभु की ऒर जा रही हैं ।उनकी मधुर  बातों की
मधुर ध्वनि  सुनकर हाथ जोड़कर श्री कृष्ण अगवानी के लिए तैयार हो गये।
वे अपनी प्रिय की अगवानी कर ने खड़े हैं।
[   ८   ]
प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी
राधे राधे  जय  राधे   बोलीं    ।
बाद्य मधुर धुनि नीचीं कीनीं  ,    सत चौकी  सत टोली  ।
निकस बाग ,राधिके आई       , मधुर ,मधुर , मधु  बोली ।
वंशी धर ,     वंशी धर दीनीं    ,  नैनन     पलकेँ    खोलीं  ।
लखत कृष्ण ठाड़े कर स्वागत    , कीर्ति  सुंदरी    डोली   ।
गुपाल ” आप्त काम  परिपूरन   ,   घेरे  सखियन  टोली ।
हिंदी  भावार्थ  : —
 
सभी सखियां राधे राधे की जय बोलने
लगीं ।बाजो की धुनि उन्होंने नीचे कर महल के सातों चौकों
को पार कर दिया  ।  मधुर मधुर बातें करती हुई वे राधिके को
बाग़ तक ले आईं । वंशी धारण   कर ने  वाले वंशीधर श्रीकृष्ण
ने अपनी वंशी अलग रख दी  , और अपनी बंद पलकें खोलीं।
श्रीकृष्ण राधिके को देख रहे हैं ,कीर्ति सुंदरी राधे सकुच गयीं ।
श्रीकृष्ण जो आप्त काम हैं ,जिन्हें किसी की आवश्यकता नहीं है

 

[    ९       ]
प्रिया प्रिय प्रथम  मिलन रस माधुरी
कीर्ति   लाडली   लोचन   खोले      ।
प्रियामिलन  प्रिय आस प्रेम छन    ,मगन हिरदय सखि   डोले  ।
मींडत   दिरग  अधीर ,  म्रग नैनी ,     राधे     सखियन,   बोले ।
दीसत  किनहिं   प्रभु   गोबिंदा       ,   कहौ  सखी    मोइ हौले    ।
भयौ  प्रकास    नैन  चुंधियावत     ,    राज   बात    कोई  खोले  ।
सुन   सुन   बतियां हांसी सखियां    ,  ” गुपाल ”  कृष्ण किलोले ।
हिंदी  भावार्थ  : —
 कीर्ति कुमारी लाडली श्री राधिके जी ने अपने
नेत्र खोले । प्रियतम श्रीकृष्ण से मिलने हेतु वे ख़ुशी हैं । हिरदय मैं
भावपूर्ण है ।   भावना से अभिभूत हैं । वे अपने नेत्रों को मींड़ती हुई
श्री राधिके अत्यंत अधीर हो रही है और अपनी सखियों को बुलाने
लगीं ।तुम मैं से क्या किसी को मेरे प्रियतम  प्रभु श्रीकृष्ण दिखाई
दे रहे हैं । हे सखीयौ मुझे  धीरे से बता दो न ।  प्रकाश के मारे मेरे
नेत्र चुँधिया रहे हैं ये क्या बात है कोई मुझे बताती क्यों नहीं है
सखियां लाडली राधिके  की बात सुनकर हंसने लगीं । श्रीकृष्ण
भी मुस्कराने लगे ।
[  १ ०     ] 
प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी
घेरा   घेर   घिरे   दोऊ       प्रानी   ।
लाल   लली    कर सखि   पकड़ाये  , सुख पावहिं सखि मानी    ।
पलक स्वतहि उठि उठि गिर  जावें  ,  दृश्य  महा सुख जानी        ।
लखत परस्पर , मानस लीला         ,       प्रीत पुरात    पुरानी      ।
काल चक्र मंथर गति चालत              भानू गति  ,बिसरानी   ।
अति आनंद भयऊ  हरि    स्रष्टि         बरसहिं  , मेघ  , लुभानी   ।
गुपाल;   राधिका   प्रभू    जोरी         , काम        रती  सरमानी  ।
हिंदी  भावार्थ  : —
सखीयौ ने घेरा डाल कर दोनों प्रिया प्रियवर को
घेर लिया। उन सबने श्रीकृष्ण राधिके के हाथ पकड़ा दिये और उन्हें
देखकर वे आनंद का अनुभव करने लगीं। दोनों के पलक पलक एक
दूसरे को देखने को उठते हैं  । दोनों एक दूसरे को देख रहे हैं , उनकी
प्रीत पुरातन अमर है । समयचक्र अपनी गति को भूल गया है तथा
सूर्य भगवान भी अपनी गति भूल गये हैं । सृष्टि आनंद मैं डूब  गयी
है आनंद मेघों से  लुभावनी वर्षा हो रही है। गोपाल कहते हैंश्रीकृष्ण
राधिके की जोड़ी श्रीकामदेव व रति को लजाने वाली है।
[    १  १    ]
प्रिया प्रिय प्रथम  मिलन रस माधुरी
निरखत ब्रजराज  सहज  सुखरासी  ।
प्रिया मिलन प्रिय आस अमोलक     ,लीनी  , प्रेम   ,   उबासी  ।
अनुपम प्रिया निहारत    माधव       नन्द गांव    , हरि बासी   ।
वंसी अधरन स्याम  सुहाबत       ,    पीताम्बर   ,    उद भासी  ।
नटवर गोप वेस  अति सुंदर        ,      लोक  लुभाबन   , हांसी   ।
पग सौं सिर तक निरखत राधे     ,   जांचत      हरि   सुखरासी ।
लोप  सखी देवी   सतवादी          ,       पुरबी  मन  अभिलासी   ।
गुपाल ” बड़  दुबिधा उपजानी      ,        लोप  ,कितै मित भासी ।
हिंदी  भावार्थ  —
ब्रजराज श्रीकृष्ण सहज ही सुख देने वाली श्रीराधिके को देख रहे हैं ।
अपनी प्रिया से मिलने की अमूल्य आस पूरी हो जाने के बाद उनने
प्रेम की उबासी ली ।  अनुपम  श्री राधिके को वे नंदगांव निवासी श्री
श्यामसुंदर देख रहे हैं ।श्यामसुंदर के पीताम्बर पड़ा हुआ है उन्होंने
वंशी को अपने अधरो से लगा लिया है  । उनका वेश अत्यंत सुंदर है
तथा उनकी हंसी लोक लुभावन है जिससे सखी लालायित हो रहीं है ।
श्री राधिके उन्हें सिर से पैर तक देख रही है ।   वे सुखराशी श्रीकृष्ण
को देख रहे हैं ।  हे सखी वह मितभाषिणी सत्यवादी सखी कहाँ लोप
हो गयी ।  मैं समझ नहीं पा रही हूँ ,प्रिय कृष्ण कहाँ से प्रकट हो गये
मैं क्या कोई स्वप्न देख  रही हूँ ।
[    १  २   ]
प्रिया प्रिय प्रथम मिलन रस माधुरी
मोटे   नैन  रुचिर  छबी   बांकी    ।
जोरत  कर प्रमुदित मन भारी    ,  अदुभुत छटा अदा   की  ।
कंचन रतन माल मनि कौस्तभ    , रस बरसाबन    झांकी   ।
चंद्र पंखुरिया मुकुट मनोहर        , केसव  , केसन  ,टांकी  ।
मदमाती      मदमोह  बढ़ानी    ,   उपमा नांहि जहां की   ।
प्रिय प्रियतमा   प्रथम भेंट       ,अमर   थात   बसुधा  की ।
हिंदी  भावार्थ   : —
श्रीकृष्ण के मोटे मोटे नयन हैं । श्री राधिके हाथ जोड़े खड़ी हैं  ।
उनकी छटा अनौखी है । कंचन आभूषण कौस्तभ मणि रत्नमाला
युक्त झांकी रस बरसा रही है। मन हरण करने वाले मुकुट मैं श्री
गोविन्द ने मोर पंख लगा रखा है । श्रीकृष्ण जी ने अपने केशों
मैं लगा राखी है ।    उनकी छबि मादकता बढाने वाली है संसार
मैं ऐसी कोई  दूसरी   उपमा नहीं है ।  यह प्रिया प्रियतम की भेंट
आनंद देने  वाली है ।
[  १  ३  ]
प्रिया प्रिय प्रथम  मिलन रस माधुरी
बुझत  स्याम  उरगांठ     बताबहिं  ।
निज मिंतर नहिं कछु छुपाबौ   जतन करहिं सुलझावहिं   ।
सुघड़ सखि  भई  ,लोप  सांवरे ,   कीनों  नेह  अगाधहिं      ।
देवलोक   कै     भूलोक देवि    , कित छूमन्त्र प्रभु बताबहिं ।
समुखि , छांड़ि सब बात पुरानी , मन मंदिर खुलबाबहिं   ।
सखी ,सखा  नारी नर एकई    , राधे        राज  बुझाबहिं  ।
गुपाल ” गुपाल प्रिया समझावें , आन  सखी सुख पाबहिं ।
हिंदी  भावार्थ      : —
हे सखी श्याम सुंदर पूछते हैं, आप अपने  हिरदय की गांठ
बता दो ।निज मित्र से कुछ नहीं छुपाना चाहिए ।  हम कोई
यत्न करेंगे जिससे तुम्हारी उलझन समाप्त हो जाये । हे प्रभु
मेरी एक सुघड़ सखी लोप हो गयी जिसने  मुझसे अगाध
स्नेह किया था। वह देवी कहाँ अद्रश्य हो गयी ,वह भूलोक
से थी या देवलोक से । हे सुंदर मुखवाली राधिके तुम इसको
अपने हिरदय से निकाल दीजिये। हे राधिके तुम्हें एक राज
बताता हूँ  नर नारी दोनों एक रूप हैं ।  श्री गुपाल अपनी प्रिय
राधिके को समझा रहे हैं । और सखियाँ मोहन व मोहिनी की
वार्ता मैं सुख ले रहे हैं